निधि स्रोत
अपने कार्यों को प्रभावशाली तरीके से क्रियाययान्वित करने हेतु नगर पालिका को धनकोष की आवश्यकता होती है। विश्व भर में स्थानीय निकायों को राज्य सरकार एवं केन्द्रिय सरकार द्वारा कर राजस्व का एक भाग उपलब्ध कराया जाता है। उस स्थानीय निकाय को, नागरीक सेवाओं की गुणवत्ता बनाने और नगर में बसने वाले नागरिकों के लाभ हेतु यह निधि उपलब्ध करायी जाती है।
74वें संवैधानिक संशोधन, नगरीय स्थानीय स्वयत्त सरकार के लिये संवैधानिक आधार प्रदान करता है और नगरीय स्थानीय निकायों के लिये राजस्व के भागों को स्पष्ट करता है।

नगर पालिका के लिये वित्त के विभिन्न स्रोत निम्न में वर्गीकृत किये जा सकते है

(अ) राजस्व
 
  • कर राजस्व
 
  • सम्पत्ति कर
 
  • स्वच्छता कर
 
  • जल कर
 
  • सीवरेज कर
(ब) कर रहित राजस्व
 
  • लाइसेन्स
 
  • जन्म मत्यु का नामंकन और प्रमाण पत्र जारी करना
 
  • नगरीय स्थानीय निकाय की सम्पत्तियों की किस्में या लीज पर होना
 
  • जल का चार्ज
स्टैम्प ठ्यूटी को एकत्र करना
जब कभी कोई सम्पत्ति एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के नाम पर स्थानान्तरित की जाती है, तो इस स्थानान्तरण का स्टैम्प एवं रजिस्ट्रेशन विभाग के कार्यालय में रजिस्टर होना आवश्यक है। प्रत्येक सम्पत्ति स्थानान्तरण के लिये स्टैम्प ठ्यूटी देय होती है। राज्य सरकार ने उस भौगोलिक क्षेत्र में आने वाली समस्त सम्पत्तियों के स्थानान्तरण के लिये स्टैम्प ठ्यूटी का प्रतिशत उपलब्ध कराया है। यह निधि ,नगरीय स्थानीय निकाय को जिला न्यायाधीश के द्वारा निस्तारित की जाती है।
केन्द्रिय वित्त आयोग के अनुमोदन के आधार पर
प्रत्येक 5 वर्ष में केन्द्रिय वित्त आयोग का संगठन किया जाता है। यह केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच राजस्व का विभाजन करने में सहायक होता है। केन्द्रिय वित्त आयोग, स्थानीय नगरीय निकायों को निधि निस्तारित करने हेतु अनुमोदन भी करता है। यह निधि /कोष, सर्वप्रथम राज्य सरकार को और फिर स्थानीय निकायों के निदेशालय के द्वारा नागरीय विकास विभाग को उपलब्ध कराया जाता है।
वर्तमान वित्त आयोग 12वीं वित्त आयोग है। इसका डा. सी रंगराजन के द्वारा नेतृत्व किया जा रहा है जोकि इस कमीशन के चेयर मैन है। इस कमीशन का आफिस नयी दिल्ली में है -तिंब14यजवाहर व्यापार भवन, 1, टोलस्टोय मार्ग, नई दिल्ली-तिंब12य
प्रत्येक 5 वर्ष में राज्य वित्त आयोग का संगठन किया जाता है। यह, स्थानीय निकायों की संस्थाओं जैसे पंचायत और नगरीय स्थानीय निकाय और राज्य सरकार के बीच राजस्व का विभाजन करने में सहायक होता है। नगरीय विकास विभाग,स्थानीय निकाय निदेशालय के द्वारा कोष को नगरीय स्थानीय निकायों को उपलब्ध कराया जाता है।
रिवोल्विंग कोष से कोष/धन
अनुदान
 
  • केन्द्रीय सरकार के द्वारा प्रोजेक्ट के लिये अनुदान
 
  • राज्य सरकार के द्वारा प्रोजेक्ट हेतु अनुदान
 
  • विकास संस्थाओं से प्रोजेक्ट हेतु अनुदान
नागरिकों के द्वारा अंश दान
 
  • वित्त/कोष पर आधारित
 
  • कोष पर आधारित न हो जैसे किसी भवन का दान
 
  • केन्द्रिय वित्त आयोग से सम्बन्धित संवैधानिक प्रबन्ध
अनुच्छेद
268- संघ राज्य द्वारा संकलित/एकत्र की गयी चुंगी को राज्य उचित उपयोग में लाता है।
269- संघ द्वारा आरोपित और एकत्रित किये गये करों को राज्य को सौपा जाता है।
270- संघ द्वारा आरोपित और एकत्रित किये गये करों का राज्य और संघ के बीच विभाजित कराना।
271- कुछ चुंगी और करों पर , संघ के उऱ्देश्यों के लिये अधिभार -सरचार्ज लगाना।
274- कर प्रणाली को प्रभावित करनें वाले उन बिलों, जिस में राज्य की रूचि होती है, के लिये राष्टपति का अनुमोदन आवश्यक है।
275- संघ के द्वारा कुछ राज्यों को अनुदान
280- वित्त आयोग
281- वित्त अयोग द्वारा अनुमोदन
मिश्रित वित्तीय प्रबन्ध
282- संघ और राज्य के द्वारा अपने राजस्व से चुकाये गये व्यय राज्य वित्त आयोग से सम्बन्धित संविधानिक प्रबन्ध
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 2431 यह कहता है कि राज्य गर्वनर,संविधानिक अधिनियम 1992 के प्रारम्भ के एक वर्ष के अन्दर, जल्द से जल्द, पांचवे वर्ष की समाप्ति पर, एक वित्त आयोग का गठन करेगा। यह आयोग पंचायतो की वित्तीय अवस्था का अवलोकन करेगा और गवर्नर को निम्न के लिये अनुमोदन करेगा
(अ) शासन के सिऱ्धान्त
 
  • इस भाग के अन्तर्गत, समस्त कर, चुंगी टौल और फीस को राज्य और पंचायत के बीच विभाजित किया जाता है
 
  • पंचायतो के द्वारा विभिन्न करो, चुंगी टौल इत्यादि के द्वारा आरोपित किया जाना।
 
  • राज्य के मिश्रित कोष से पंयायतों को अनुदान दिया जाना
(ब) पंचायतो की वित्तीय अवस्था को सुधारने हेतु किये गये विभिन्न उपाय
(स) गर्वनर के द्वारा, वित्तीय आयोग को, पंचायतो के सशक्त वित्त/कोष के लिये उल्लेखित कराना के अन्तर्गत संगठित किया गया वित्त आयोग समान प्रकार का अनुमोदन नगर पालिका को करेगा।
राज्य वित्त आयोग के द्वारा किये गये समस्त अनुमोदनों और उनके एक स्पस्टीकरण को, गर्वनर के लिये, राज्य विधान सभा के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक है।